Wednesday, 27 February 2019

के आयोजकों

के आयोजकों



समय ग्रामीण लोग अधिकतर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बैलगाड़ी आदि का उपयोग करते थे। कोई भी शुभ त्योहार हो, या कोई प्रयोजन, ब

ड़ा से बड़ा मेला जगह-जगह लगता था और मेला जाने के लिए लोग लगभग 10-15 दिन पहले से ही तैयारी शुरु कर देते थे। कुछ लोग पैदल ही गोल बना

कर रात को खा-पीकर निकल जाते थे और सुबह होते-होते मेले की जगह पर पहुँच जाते थे। कुछ लोग बैलगाड़ी आदि नाँधकर निकल जाते थे। ये लोग मेला

करने कभी-कभी पैदल ही 10-12 कोस तक चले जाते थे और उधर से कुदाल, हँसुआ, हत्था (पानी उचीलने का साधन), कुड़ी (खेतों में सिचाईं के काम

आनेवाला बरतन जिसमें रस्सी बाँधकर कुएँ, तालाब आदि से पानी निकाला जाता है) आदि खेती-किसानी के सामान के साथ ही पहँसुल, लोड़ा आदि भी ख


रीदते थे और साथ ही ओसौनी के साथ ही बाँस की बनी अन्य चीजें। हर परिवार अपने परिवार के छोटे बच्चों के लिए लकड़ी के बने खिलौने और तिपहिया गाड़ी खरीदना नहीं भूलता था।

ऐसा नहीं है कि मेले आज नहीं लगते पर आज के मेले पर आधुनिकता पूरी तरह से

हाबी हो गया है और साथ ही ये पारंपरिकता से बहुत ही दूर हो गए हैं, पर उस समय के मेलों की अपनी खासियत होती थी। लोग कुछ विशेष चीजों को खरीदने

के लिए किसी विशेष जगह पर लगने वाले मेले का इंतजार करते थे। भूत की पूरी कहानी शुरू करने से पहले मुझे एक छोटा भूतही रोचक किस्सा याद आ रहा

है

समय

समय


ली दर्शन हेतु एक काली मंदिर में गई थी। काली का यह मंदिर एक जंगल में था पर आस-पास में बहुत सारी दुकानें, धर्मशाला आदि भी थे, कच्ची-पक्की सड़कें भी बनी हुई थीं...पर घने-उगे जंगली पेड़-पौधे इसे जंगल हो

ने का भान कराते थे। यह काली मंदिर बहुत ही जगता स्थान माना जाता था। यहाँ हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती थी पर मंदिर के अंदर जाने का स

मय सुबह 8 बजे से लेकर रात के 8 बजे तक ही था। भक्तों की उमड़ती भीड़ को देखते हुए मंदिर में मुख्य दरवाजे के अलावा एक और दरवाजा खो

ल दिया गया था ताकि भक्तजन मुख्य दरवाजे से दर्शन के लिए प्रवेश करें और दूसरे दरवाजे से निकल जाएँ।

खुनिया गाँव की मंडली शाम को 6 बजे दर्शन के लिए मंदिर पहुँची और दर्शन करने बा

द मंदिर के आस-पास घूमकर वहाँ लगे मेले का आनंद लेने लगी। मेले में घूमते-घामते यह मंडली अपने निर्भयपन का परिचय देते हुए जंगल में थोड़ा दू

र निकल गई। रात होने लगी थी, मंडली का कोई व्यक्ति कहता कि अब वापस चलते हैं, कल दिन में घूम लेंगे पर कोई कहता डर रहे हो क्या, इतने लो

ग हैं, थोड़ा और अंदर चलते हैं फिर वापस आ जाएँगे। ऐसा करते-करते यह मंडली उस जंगल में काफी अंदर चली गई। रात के अंधेरे में अब मंडली

को रास्ता भी नहीं सूझ रहा था और न ही मंदिर के आस-पास जलती कोई रोशनी ही दिख रही थी। अब मंडली यह समझ नहीं पा रही थी कि

किस ओर चलें। खैर, मंडली के एक व्यक्ति ने अपनी जेब से माचिस निकाली और झोले में रखे कुछ कागजों को जलाकर रोशनी कर दी।