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के आयोजकों
समय ग्रामीण लोग अधिकतर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बैलगाड़ी आदि का उपयोग करते थे। कोई भी शुभ त्योहार हो, या कोई प्रयोजन, ब
ड़ा से बड़ा मेला जगह-जगह लगता था और मेला जाने के लिए लोग लगभग 10-15 दिन पहले से ही तैयारी शुरु कर देते थे। कुछ लोग पैदल ही गोल बना
कर रात को खा-पीकर निकल जाते थे और सुबह होते-होते मेले की जगह पर पहुँच जाते थे। कुछ लोग बैलगाड़ी आदि नाँधकर निकल जाते थे। ये लोग मेला
करने कभी-कभी पैदल ही 10-12 कोस तक चले जाते थे और उधर से कुदाल, हँसुआ, हत्था (पानी उचीलने का साधन), कुड़ी (खेतों में सिचाईं के काम
आनेवाला बरतन जिसमें रस्सी बाँधकर कुएँ, तालाब आदि से पानी निकाला जाता है) आदि खेती-किसानी के सामान के साथ ही पहँसुल, लोड़ा आदि भी ख
रीदते थे और साथ ही ओसौनी के साथ ही बाँस की बनी अन्य चीजें। हर परिवार अपने परिवार के छोटे बच्चों के लिए लकड़ी के बने खिलौने और तिपहिया गाड़ी खरीदना नहीं भूलता था।
ऐसा नहीं है कि मेले आज नहीं लगते पर आज के मेले पर आधुनिकता पूरी तरह से
हाबी हो गया है और साथ ही ये पारंपरिकता से बहुत ही दूर हो गए हैं, पर उस समय के मेलों की अपनी खासियत होती थी। लोग कुछ विशेष चीजों को खरीदने
के लिए किसी विशेष जगह पर लगने वाले मेले का इंतजार करते थे। भूत की पूरी कहानी शुरू करने से पहले मुझे एक छोटा भूतही रोचक किस्सा याद आ रहा
है
समय ग्रामीण लोग अधिकतर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बैलगाड़ी आदि का उपयोग करते थे। कोई भी शुभ त्योहार हो, या कोई प्रयोजन, ब
ड़ा से बड़ा मेला जगह-जगह लगता था और मेला जाने के लिए लोग लगभग 10-15 दिन पहले से ही तैयारी शुरु कर देते थे। कुछ लोग पैदल ही गोल बना
कर रात को खा-पीकर निकल जाते थे और सुबह होते-होते मेले की जगह पर पहुँच जाते थे। कुछ लोग बैलगाड़ी आदि नाँधकर निकल जाते थे। ये लोग मेला
करने कभी-कभी पैदल ही 10-12 कोस तक चले जाते थे और उधर से कुदाल, हँसुआ, हत्था (पानी उचीलने का साधन), कुड़ी (खेतों में सिचाईं के काम
आनेवाला बरतन जिसमें रस्सी बाँधकर कुएँ, तालाब आदि से पानी निकाला जाता है) आदि खेती-किसानी के सामान के साथ ही पहँसुल, लोड़ा आदि भी ख
रीदते थे और साथ ही ओसौनी के साथ ही बाँस की बनी अन्य चीजें। हर परिवार अपने परिवार के छोटे बच्चों के लिए लकड़ी के बने खिलौने और तिपहिया गाड़ी खरीदना नहीं भूलता था।
ऐसा नहीं है कि मेले आज नहीं लगते पर आज के मेले पर आधुनिकता पूरी तरह से
हाबी हो गया है और साथ ही ये पारंपरिकता से बहुत ही दूर हो गए हैं, पर उस समय के मेलों की अपनी खासियत होती थी। लोग कुछ विशेष चीजों को खरीदने
के लिए किसी विशेष जगह पर लगने वाले मेले का इंतजार करते थे। भूत की पूरी कहानी शुरू करने से पहले मुझे एक छोटा भूतही रोचक किस्सा याद आ रहा
है





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